फ़लसफ़ा

थक जाऊ, ज़रा आराम तो हो,

चला जाता हूँ कब से , ये सफ़र कैसा.

पाया हैं, वो भी बहोत कुछ,

छूटता जाता हैं , हथेलियों पे रेत् जैसा .

मंज़िल – उसकी आरज़ू तो ना थी ,

अंधा दौड़ हैं बस, ना जाने कैसा .

सांसे अभी बाक़ी हैं मुझमें,

फूटेगी – पानी के बुल बुले जैसा.

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अंज़ाम

Anjaam

लहरों से दोस्ती की हमने,

मुझें तो डूब के मरना था,

यहीं आगाज़ था मेरा, यहीं अंज़ाम होना था.

रह ना सका कोई, सिर्फ “मैं ” के सिवा,

काफ़िला जहाँ का, मुझें तो भीड़ मे खोना था.

किस किस को दिखाऊ, ये रंग ख़ून -ये -जिग़र का,

प्याला रहा सामने, मुझें तो प्यासा ही रहना था.

यहीं आगाज़ था मेरा, यहीं अंज़ाम होना था.