रफ्ता

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अंज़ाम

Anjaam

लहरों से दोस्ती की हमने,

मुझें तो डूब के मरना था,

यहीं आगाज़ था मेरा, यहीं अंज़ाम होना था.

रह ना सका कोई, सिर्फ “मैं ” के सिवा,

काफ़िला जहाँ का, मुझें तो भीड़ मे खोना था.

किस किस को दिखाऊ, ये रंग ख़ून -ये -जिग़र का,

प्याला रहा सामने, मुझें तो प्यासा ही रहना था.

यहीं आगाज़ था मेरा, यहीं अंज़ाम होना था.

कारवां

डोर अभी कुछ कच्ची थी,

टूट जाएं तो चलूँ.

आँख अभी कुछ नम थी,

सुर्ख़ हो जाये तो चलूँ.

बहार अभी बुलंदियों पर तो ना थी,

पतझड़ आये तो चलूँ.

कुछ तो ख्वाब अभी मैंने देखे हैं,

बिखर जाये तो चलूँ.