Urdu poems

कोई

दिलों का वास्ता अगर रूह से होता,

तो सीने में दर्द का मंज़र बतलाये कोई |

मेरे अध् मरे से ख्वाब अगर ज़िंदा है,

तो आँखों में नींद भी आये, ये समझाये कोई |

किनारे पर पहुंचने की ये कश्मकश,

डूबने वाले को भी दिखलाये कोई |

चाँद, आशमा, ये तारे और फलक,

अँधेरे से इस घर में रोशनी तो जलाये कोई |

दिलों का वास्ता अगर रूह से होता,

तो सीने में दर्द का मंज़र बतलाये कोई |


Urdu meanings in English

मंज़र (manzar): A scene

कश्मकश (kashmakash): Tussle

रूह (ruuh): Soul

Reference : https://www.rekhta.org/urdudictionary/

Urdu poems

आईना

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ना परवाही की आदत अब कुछ इस क़दर है मुझ में,

कि ख़ून का रंग भी सफ़ेद नज़र आता है.

दरख्तों के शोर -गुल अब लगते हैं ऐसे,

कि हर एक घोंसले में बाज़ नज़र आता है.

राह के लोग अब होते नहीं अंजान,

कि हर एक चेहरें में अपना माज़ी नज़र आता है.

तुमने आँसू बेकार ही जाया किये होंगे,

कि हर एक दरिया में समंदर नज़र आता है.

ना परवाही की आदत अब कुछ इस क़दर हैं मुझ में,

कि ख़ून का रंग भी सफ़ेद नज़र आता है.

Urdu poems

अनकही

नादाँ मेरे, बस इतना बता

इस मोड़ मुड़ा तो होगा कोई ?

ये राख़ भरी सी बस्ती में,

कभी शहर बसा तो होगा कोई?

जहाँ सुनते हो तुम सिसकारि,

एक लम्हा हँसा तो होगा कोई?

क़दमों में उड़ते हो ख़ाक जहाँ,

होगा आँगन में खिलता फूल कोई ?

नादाँ मेरे बस इतना बता,

इस मोड़ मुड़ा तो होगा कोई?

Urdu poems

प्यास

दौर शुरू हुआ नज़ाकत से शरारत का,

वो लम्हा था एहतराम उल्फत का,

बस एक प्याला था, टूट गया,

नहीं है हम पेरशान………………..

ना जाने क्यों,

कम्बख्त प्यास सी लगी रहती है हमेशा.

Urdu poems

फ़लसफ़ा

थक जाऊ, ज़रा आराम तो हो,

चला जाता हूँ कब से , ये सफ़र कैसा.

पाया हैं, वो भी बहोत कुछ,

छूटता जाता हैं , हथेलियों पे रेत् जैसा .

मंज़िल – उसकी आरज़ू तो ना थी ,

अंधा दौड़ हैं बस, ना जाने कैसा .

सांसे अभी बाक़ी हैं मुझमें,

फूटेगी – पानी के बुल बुले जैसा.

Urdu poems

कारवां

डोर अभी कुछ कच्ची थी,

टूट जाएं तो चलूँ.

आँख अभी कुछ नम थी,

सुर्ख़ हो जाये तो चलूँ.

बहार अभी बुलंदियों पर तो ना थी,

पतझड़ आये तो चलूँ.

कुछ तो ख्वाब अभी मैंने देखे हैं,

बिखर जाये तो चलूँ.

Urdu poems

सौदा

ख़त्म होती तो कहानी कुछ और होती,

तेरी मेरी ज़ुबानी कुछ और होती.

ऐसी तो ताज़ियत ज़माने की ना थी,

ख़ुदा का वास्ता होता तो कुछ और होती.

खुशियाँ जहाँ से चुरा लाता मैं,

बाज़ार में बिकती, तो कुछ और होती.

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ताज़ियत – lamenting