उसूल, Urdu poems and recitals

हालते -ये – फरामोश

ना मैं तेरा ही हुआ, ना हुआ उसूलों का,

एक आसूँ ना रहा, ना डर रहा छलक जाने का|

मुझसे रुस्वाई भी हैं और कई मुश्किल भी,

मेरे पास ये बहाना भी ना रहा, रूठ जाने का|

कतरा कतरा ही रिसा करता हूँ,

अब कोई चारा ना रहा संभल जाने का|

बड़ी जुल्मत भी रही और रही तंजीयत भी,

कई बार इरादा भी हुआ वादे से मुकर जाने का|

ना मैं तेरा ही हुआ, ना हुआ उसूलों का|