कोई

दिलों का वास्ता अगर रूह से होता,

तो सीने में दर्द का मंज़र बतलाये कोई I

मेरे अध् मरे से ख्वाब अगर ज़िंदा है,

तो आँखों में नींद भी आये, ये समझाये कोई I

किनारे पर पहुंचने की ये कश्मकश,

डूबने वाले को भी दिखलाये कोई I

चाँद, आशमा, ये तारे और फलक,

अँधेरे से इस घर में रोशनी तो जलाये कोई I

दिलों का वास्ता अगर रूह से होता,

तो सीने में दर्द का मंज़र बतलाये कोई I

आईना

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ना परवाही की आदत अब कुछ इस क़दर है मुझ में,

कि ख़ून का रंग भी सफ़ेद नज़र आता है.

दरख्तों के शोर -गुल अब लगते हैं ऐसे,

कि हर एक घोंसले में बाज़ नज़र आता है.

राह के लोग अब होते नहीं अंजान,

कि हर एक चेहरें में अपना माज़ी नज़र आता है.

तुमने आँसू बेकार ही जाया किये होंगे,

कि हर एक दरिया में समंदर नज़र आता है.

ना परवाही की आदत अब कुछ इस क़दर हैं मुझ में,

कि ख़ून का रंग भी सफ़ेद नज़र आता है.

अनकही

नादाँ मेरे, बस इतना बता

इस मोड़ मुड़ा तो होगा कोई ?

ये राख़ भरी सी बस्ती में,

कभी शहर बसा तो होगा कोई?

जहाँ सुनते हो तुम सिसकारि,

एक लम्हा हँसा तो होगा कोई?

क़दमों में उड़ते हो ख़ाक जहाँ,

होगा आँगन में खिलता फूल कोई ?

नादाँ मेरे बस इतना बता,

इस मोड़ मुड़ा तो होगा कोई?

प्यास

दौर शुरू हुआ नज़ाकत से शरारत का,

वो लम्हा था एहतराम उल्फत का,

बस एक प्याला था, टूट गया,

नहीं है हम पेरशान………………..

ना जाने क्यों,

कम्बख्त प्यास सी लगी रहती है हमेशा.

फ़लसफ़ा

थक जाऊ, ज़रा आराम तो हो,

चला जाता हूँ कब से , ये सफ़र कैसा.

पाया हैं, वो भी बहोत कुछ,

छूटता जाता हैं , हथेलियों पे रेत् जैसा .

मंज़िल – उसकी आरज़ू तो ना थी ,

अंधा दौड़ हैं बस, ना जाने कैसा .

सांसे अभी बाक़ी हैं मुझमें,

फूटेगी – पानी के बुल बुले जैसा.

अंज़ाम

Anjaam

लहरों से दोस्ती की हमने,

मुझें तो डूब के मरना था,

यहीं आगाज़ था मेरा, यहीं अंज़ाम होना था.

रह ना सका कोई, सिर्फ “मैं ” के सिवा,

काफ़िला जहाँ का, मुझें तो भीड़ मे खोना था.

किस किस को दिखाऊ, ये रंग ख़ून -ये -जिग़र का,

प्याला रहा सामने, मुझें तो प्यासा ही रहना था.

यहीं आगाज़ था मेरा, यहीं अंज़ाम होना था.